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पश्चिम बंगाल। बंगाल मे क्यों कटे 28। लाख वोटरों के नाम. कौन है ये लोग फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख क? पश्चिम बंगाल से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट

बंगाल में क्यों कटे 28 लाख वोटरों के नाम? कौन हैं ये लोग, फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख कब?

पश्चिम बंगाल से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल इस समय पूरे देश की सबसे चर्चित राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। वजह है मतदाता सूची का Special Intensive Revision यानी SIR, जिसकी वजह से लाखों लोगों की धड़कनें तेज हैं। राज्य में चल रही वोटर लिस्ट की इस बड़ी एक्सरसाइज में अब तक 28 लाख लोगों के नाम काट दिए गए हैं और इससे राजनीतिक तापमान तेजी से बढ़ गया है।

SIR फॉर्म जमा करने की अंतिम तारीख 4 दिसंबर रखी गई है, जबकि पूरी प्रक्रिया 7 फरवरी तक चलेगी। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर नाम क्यों हटाए जा रहे हैं और ये कौन लोग हैं?

28 लाख नाम क्यों काटे गए? चौंकाने वाली वजहें सामने आईं

पश्चिम बंगाल में SIR का डिजिटाइजेशन तेजी से चल रहा है और अब तक करीब 78% काम पूरा हो चुका है। इसी दौरान सामने आया कि 28 लाख से ज्यादा वोटर लिस्ट से बाहर कर दिए गए हैं। इनमें से 9 लाख वोटर ऐसे पाए गए जिनका निधन हो चुका है। बाकियों के बारे में या तो कोई जानकारी नहीं मिली,या वे डुप्लीकेट थे,या स्थाई रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके थे।

एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा करीब 26 लाख नाम 2002 की मतदाता सूची से मैच ही नहीं कर रहे, और यह अंतर तभी समझ आया जब मौजूदा लिस्ट की तुलना 2002 और 2006 के SIR डेटा से की गई।

ममता बनर्जी का बड़ा हमला: “यह पीछे के रास्ते से एनआरसी है”

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस पूरे SIR अभियान पर खुलकर हमला कर रही हैं। उनका दावा है कि सरकार और चुनाव आयोग मिलकर एक बड़ी साजिश कर रहे हैं।

ममता का आरोप है कि SIR के जरिए एनआरसी लागू करने की कोशिश हो रही है,असली वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं और बीजेपी चुनाव आयोग पर दबाव बना रही है।

उन्होंने बीएसएफ को भी कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि अगर घुसपैठिए बंगाल में हैं, तो वे पहुंचे कैसे? सीएम ममता ने यहां तक कहा कि अगर उनके लोगों को टारगेट किया गया, तो वह पूरे देश में आंदोलन खड़ा कर देंगी।

BLO पर बढ़ता दबाव, 25 से ज्यादा की मौत: सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला

देशभर के 12 राज्यों में चल रही इस SIR प्रक्रिया में लगभग 5 लाख BLO तैनात हैं। लेकिन सबसे चिंताजनक खबर यह है कि अब तक 25 से ज्यादा BLO की मौत हो चुकी है। ममता का दावा है कि सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 30 से ज्यादा BLO की मौत हुई है। मामला इतना गंभीर हो गया कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है।

SIR में 10 लाख से ज्यादा फॉर्म अमान्य पाए गए

मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल के मुताबिक 10 लाख से ज्यादा फॉर्म गलत या अधूरे पाए गए हैं,कई घरों में लोग मिले ही नहीं,कई नाम डुप्लीकेट थे, कई वोटर लंबे समय से गायब थे। यही कारण है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटने पड़े।

शहरों में जहां SIR को लेकर डर और भ्रम है, वही ग्रामीण इलाकों का माहौल अलग है। लोगों की भीड़ लगातार BLO के पास फॉर्म भराने के लिए उमड़ रही है।

टीएमसी की बड़ी तैयारी: 28 नवंबर को EC से मिलेंगे सांसद

TMC ने इस मुद्दे को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। डेरेक ओ’ब्रायन ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर आयोग से मिलने की मांग की है। हालांकि आयोग ने 10 नहीं, सिर्फ 5 सांसदों को मिलने की अनुमति दी है।

क्या आधार कार्ड होने भर से वोट डालने का अधिकार मिल सकता है? सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने 26 नवंबर को उन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की जिनमें कई राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने साफ कहा कि आधार को नागरिकता का अचूक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

चीफ जस्टिस सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में दर्ज प्रविष्टियों की सत्यता जांचने का चुनाव आयोग के पास स्वाभाविक और वैधानिक अधिकार है। फॉर्म 6 वही आवेदन है जिसके जरिए नया मतदाता बनने के लिए नाम दर्ज कराया जाता है।

अदालत ने आधार की सीमाओं पर कहा, “आधार एक लाभ पाने के लिए दिया गया दस्तावेज है। अगर किसी व्यक्ति को राशन के लिए आधार दे दिया गया तो क्या वह स्वतः ही वोटर भी हो जाएगा? अगर कोई पड़ोसी देश का नागरिक मजदूरी के लिए भारत आता है और उसके पास आधार बन गया, तो क्या उसे वोट डालने दिया जाए?”

बेंच ने याचिकाकर्ताओं से यह भी पूछा,”क्या आप कहना चाहते हैं कि चुनाव आयोग सिर्फ एक पोस्ट ऑफिस है जिसे फॉर्म 6 मिलते ही नाम जोड़ देना चाहिए?”

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि SIR प्रक्रिया आम मतदाताओं पर असंवैधानिक बोझ डालती है। कई लोग कागजी प्रक्रियाओं को पूरा नहीं कर पाएंगे और इसका नतीजा यह होगा कि उनका नाम मतदाता सूची से कट सकता है। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र को प्रभावित करती है।

बेंच ने कहा कि यह दलील कि पहले कभी ऐसी प्रक्रिया नहीं की गई, चुनाव आयोग के अधिकार को कमजोर नहीं कर सकती। हां, अगर किसी मतदाता का नाम काटना है तो उससे पहले उचित नोटिस देना अनिवार्य है।

अलग-अलग राज्यों में SIR पर सुनवाई की समयसीमा तय

सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग राज्यों में दायर याचिकाओं पर सुनवाई का कार्यक्रम भी तय किया। तमिलनाडु से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग को 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करना होगा। इसके बाद दो दिन के भीतर प्रत्युत्तर दायर किए जाएंगे और 4 दिसंबर को सुनवाई होगी।

 

केरल से संबंधित याचिकाएं 2 दिसंबर को सुनी जाएंगी। आयोग को 1 दिसंबर तक जवाब देना होगा। पश्चिम बंगाल से जुड़े मामले, जहां कुछ बूथ लेवल अधिकारियों की आत्महत्या की खबरें सामने आई हैं, 9 दिसंबर को सूचीबद्ध किए गए हैं। चुनाव आयोग इस सप्ताहांत जवाब दाखिल करेगा, जबकि राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग 1 दिसंबर तक अपना पक्ष रखेंगे।

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